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अरावली रेंज सुप्रीम कोर्ट फैसला: क्या भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला खतरे में है?

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Aravali hills supreme court judgement: भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला Aravali hills supreme court judgement  आने के बाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। 20 नवंबर 2025 को आए इस फैसले ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को नया रूप दिया है, जिससे पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में गहरी चिंता देखी जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि इस निर्णय के बाद अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है।


🌄 अरावली रेंज का परिचय और ऐतिहासिक महत्व

अरावली पर्वतमाला लगभग 3 अरब साल पुरानी मानी जाती है, जो हिमालय से भी अधिक प्राचीन है। यह 692 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसका लगभग 80 प्रतिशत भाग राजस्थान में स्थित है।

इतिहास और भूगोल के साथ-साथ अरावली भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ भी मानी जाती है।


🌱 पारिस्थितिकीय दृष्टि से अरावली क्यों जरूरी है?

Aravali hills supreme court judgement  केवल कानूनी नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहद अहम है, क्योंकि अरावली:

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  • थार मरुस्थल को दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी यूपी में फैलने से रोकती है
  • भूजल के लिए एक महत्वपूर्ण रिचार्ज जोन है
  • दिल्ली-एनसीआर की हवा और तापमान को संतुलित करती है
  • चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का उद्गम स्थल है
  • जैव विविधता और वन्यजीवों का प्राकृतिक आश्रय है

⚖️ क्या है अरावली रेंज सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला?

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की एक नई परिभाषा तय की:

  • केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली माना जाएगा
  • दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ यदि 500 मीटर के भीतर हों, तभी उन्हें अरावली रेंज कहा जाएगा

इस नई परिभाषा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।


🚨 संरक्षण पर संभावित खतरा

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस नई परिभाषा के कारण अरावली का लगभग 90% हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है।
FSI के अनुसार राजस्थान में 1.19 लाख पहाड़ियों में से केवल 1–1.5% ही 100 मीटर से ऊँची हैं।

इसका सीधा मतलब यह है कि छोटी पहाड़ियों पर:

  • खनन
  • रियल एस्टेट
  • निर्माण गतिविधियाँ
    तेजी से बढ़ सकती हैं।

⛏️ खनन और पर्यावरणीय नुकसान

अरावली में पहले से ही खनन के कारण अजमेर से झुंझुनू तक 12 से ज्यादा दरारें बन चुकी हैं।
हरियाणा के भिवानी, चरखी दादरी, गुरुग्राम और नूंह जैसे इलाकों में अरावली लगभग खत्म होने की कगार पर है।

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महेंद्रगढ़ में भूजल स्तर 1500–2000 फीट तक गिर चुका है, जो गंभीर संकट का संकेत है।

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🏛️ सरकार बनाम विशेषज्ञों की राय

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना है कि सरकार संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और कई क्षेत्रों को “नो-गो ज़ोन” घोषित किया गया है।
वहीं विशेषज्ञों का तर्क है कि:

  • खनन टिकाऊ नहीं होता
  • नई परिभाषा के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है
  • FSI की रिपोर्टों को नजरअंदाज किया गया

📜  Aravali hills supreme court judgement: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार

यह फैसला 1995 के टी.एन. गोदावर्मन केस से जुड़ा है, जिसमें वन क्षेत्रों की परिभाषा तय की गई थी।
अदालत ने राज्यों में अलग-अलग परिभाषाओं से उपजे भ्रम को दूर करने के लिए CEC का गठन किया।


🔍 निष्कर्ष

Aravali hills supreme court judgement  भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा के भविष्य से जुड़ा हुआ है। अगर संरक्षण कमजोर पड़ा, तो इसका असर सिर्फ पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी और जलवायु पर भी पड़ेगा।

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अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार और न्यायपालिका इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए आगे क्या कदम उठाती है।


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